टि.पि.एम के सेवको का विश्वास जीवन

विश्वास जीवन ! सच्चमे?  

टि.पि.एम के सेवक / विश्वासी बडे घमंड के साथ लोगो के सामने कहते है, कि संत लोगो को अन्य कलीसीया के पादरी कि तरह तनखा नही मीलती; वे विश्वास जीवन जीते है. यदि ऐसा है तो हम पुछते कि क्या रोमन केथोलीक पोप को तनखा मिलती? क्या ओर्थोडोक्स कलीसीया के सन्यासीयी पदरीयो को और नन सीस्टर्स को तनखा दि जाती? नही ना! क्या साधु / सन्यासी और रीशी-मुनी भी अपना दावा नही ठोक सकते कि वे भी विश्वास जीवन जी रहे?

पुराने नियम मे लेवीयो कि कोइ सम्पत्ती नही होती थी, किंतु वे लोगो के दिये दस्वांश पर जीते थे. परमेश्वर ने इस्रायेलीयो को अपने कमाइ का दस्वांश लेवीयो को देने कि प्रथा ठहराइ थी. इसलीये निश्चीत रुप से हर महीने दस्वांश मे मिली राशी पर जीवीत रहना विश्वास का जीवन नही कहलाया जा सकता था. अब क्योकि टि.पि.एम के सेवक भी इसी रीती से पुराने नियम के लीवीयो के समान दसवांश पर जीते है, इसलीये इनके इस जीवन शैली को भी विशवास का जीवन नही कहा जा सकता है. टि.पि.एम के सेवको को निश्चीत रुप से मालुम रहता कि उनके कलीसीया के सदस्यो के कमाई का 10% हिस्सा, हर महीने नियमीत रीती से उन्हे मिलनेवाला है. इसलीये इसमे विश्वास कि अवश्यकता नही.

आपकी जानकारी के लीये:  पास्टर पौल रामनकुट्टी ने जब यह सेवा शुरु कि तो अपना घर और जमीन बेच दिया, और जो पैसा मिला उसका इस्तेमाल किया. यदि वे इस पैसे को अपने पास अपने भवीश्य के लीये रखने के बदले, इस पैसे को गरीबो मे बाट देते, और गाव-गाव और शहर-शहर घुम कर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाते, तो यह विश्वास जीवन होता! किंतु रमाकुट्टी कि तरह तो आप भी कर सकते. आप अपना घर और जमीन बेच दो, और जो पैस मिले, उससे अपना गुजारा करलो. मुझे पुरा यकिन है कि यह पैसा कम से कम आपको दस वर्ष तक तो अवश्य पुरेंगा! चलो मान भी लेते है कि पास्टर रामनकुट्टी ने विश्वास का जीवन जीया होंगा, किंतु आज के टि.पि.एम के सेवक, विश्वास जीवन जी रहे यह कहना मुमकीन नही. ये नियमीत निशचीत रुप से मिलनेवाले दस्वांश पर जीते है. यही बात केथोलीक पादरी और नन पर भी लागु है. इसमे इतना घमंड करने कि कोइ बात नही.

विश्वास जीवन बनामा दस्वांश जीवन

विश्वास से जीने और दस्वांश से मिलनेवाले पैसो से जीने मे फरक है. जब यीशु ने चेलो को गाव गाव फिरकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाने कि आज्ञा दि (लुका 9:6), तो कहा था कि न तो झोली लेना और न बटुवा क्योकि परमेश्वर इस बात को निश्चीत करेंगा कि मजदुर को उसकी मजदुरी मिलनी चाहीये. ध्यान दे कि यीशु ने कभी भी उन्हे विशेष रीती के कपडे पहीनावा को धारण करने को नही कहा। जब आप टि.पि.एम के सेवको कि तरह विशेष पहीरावा पहीनते हो, तो लोगो को आपके कपडे देख कर पता चल जाता कि यह तो भीक्षु है! इस तरह के कपडे पहने देखकर लोग आपको दान देते है। येशु के चेलो ने इसलीये कभी विशेष पहीनावा नही पहना। एक और बात पर गौर करना चाहीये कि एक नगर से दुसरे मे घुमते हुये परमेश्वर के राज्य का प्रचार करना एक बात है, और लेवीयो कि तरह किसी नगर मे रहकर दस्वांश का हर महीने नियमित तरीके से आना, दुसरी बात है. नगर-नगर फिरने मे विश्वास लगता है, क्योकि नये नगर मे आप किसी को न पहीचानते और बीन पैसो के उस स्थान पर कैसे रहोंगे इसका आपको कुछ अंदाजा नही होता है. और न ही आपके पास भीक्षु वाले कपडे होते कि लोगो को इशारा मिले कि लोग आपको खाने को दे दे. बाइबल के अनुसार कलीसीया के सदस्यो के दसवांश पर एक स्थाइ शात्न मे सेवा करने को बीशप (निरक्षक) और डीकन (सेवक) कि सेवा कहा गया है (1 तीमुथी 3). बीशप और डीकन कि सेवा नगर नगर घुमकर सेवा करना नही होता। इस नगर नगर घुमकर विश्वास पर जीने मे और एक कलीसीया मे घर बनाकर जीवन भर रहने मे जो अंतर है, उसे समझे बीना, पास्टर रामनकुट्टी ने पवीत्र शास्त्र के मत्ती 19:16-30 के संदर्भ को तोड मरोडकर, टि.पि.एम के विश्वास जीवन क निर्माण कर डाला.

मत्ती 19 मे, यीशु ने उस धनी पुरुष को अपना सब कुछ छोडकर यीशु के पीछे आने को कहा (अनंत जीवन पाने के लीये). इस बात का टि.पि.एम के विश्वास जीवन से कोइ लेना देना नही. अपना सब कुछ छोडकर क्रुस को उठा लेना, (मत्ती 19:16-30), यह हमारे “स्वंय” कि मृत्यु का प्रतीक था. यीशु अपने क्रुस कि मृत्यु के मार्ग पर यात्रा मे था. धनी मनुष्य के अनंत जीवन पाने के लीये उसका यीशु के पीछे क्रस उठाकर क्रुस के स्थान तक जाना अनीवार्य था. इसलीये यीशु ने कहा कि मेरा चेला होने के लीये मेरे पीछे आओ. मै तो क्रुस कि और बढ रहा हु. तुम भी अपना अपना क्रुस उठाकर मेरे पीछे आओ। यह बात हर मसीही भाइ बहन के लीये अनीवार्य है (मत्ती 16:24, लुका 14:26-27). हम सभी के लीये यह अवश्यक है कि हम अपना अपना क्रुस उठाकर यीशु के पीछे हो ले. हम उसके साथ ग़ाडे जाकर नये जीवन मे जीवीत हो जाय (पढे रोमी 6:2-3). यीशु के साथ गाडे जाने (मरने) और पुनरुत्थान पाने मे हमारा पुराना मनुष्त्व मर जाता है. हमारा जो भी है, हमारे स्वय के साथ, वह सुली पर चढ जाता है. हम नये मनुषत्व के नये जीवन मे जीलाये जाते है. इसलीये मत्ती 19 का टि.पि.एम के विश्वास जीवन से कोइ लेना देना नही है.

बुनीयादी वचन को तोडना मरोडना.

टि.पि.एम के अनुसार पास्टर पाल रामनकुट्टी ने अपने विश्वास जीवन को इस वचन के आधार पर स्थापित किया – “धर्मी जन विश्वास से जीवीत रहेंगा (उनके जीवनकथा के चौथे अध्याय के पाचवा पेराग्राफ देखे).” इसमे लीखा है कि परमेश्वर आप रामनकुट्टी से बाते करने लगे और कहा  – “क्या तु सब छोडने को तैयार है? मै तेरी सारी आवश्यकता पुरी करुंगा. धर्मी जन विश्वास से जीवीत रहेंगा.” किंतु प्रेरीत पौलुस के अनुसार “धर्मी जन विश्वास से जीवीत रहेंगा (गलाती 3:11)” का संदर्भ उद्धार और अनंत जीवन से है, न कि इस पृथ्वी के शारीरीक भोजन के और खाने-पिने से सम्बंधीत! धर्मी जन विश्वास से जीवीत रहेंगा का अर्थ है कि एक धर्मी पुरुश, अनंत समय के लीये जीवीत रहेंगा। वह अनंत जीवन पायेंगा; उसका नाश न होंगा; यह उसके यीशु मसीह पर विश्वास करने से होंगा. उसका यीशु मसीह पर विश्वास उसे नाश से बचायेंगा और वह अनंत जीवन पायेंगा. यह इस वचन “धर्मी जन विश्वास से जीवीत रहेंगा” का अर्थ है. किंतु पोल रामन कुट्टी ने इस वचन के अर्थ को संसारीक भोजन को विश्वास से पाकर जिंदा रहने मे बदल डाला. संसार के जीवन के प्रतीदिन के भोजन को विश्वास से प्रापर मिलेंगा ऐसा इस वचन का अर्थ लागया. इसे कहते है वचन को तोडना मरोडना और लोगो को धोका देना. शर्म कि बात है कि टि.पि.एम कहता है कि परमेश्वर ने रामनकुट्टी से स्वय आकर इस वचन को तोडा मरोडा !! कितनी शर्मनाक बात है. यह परमेश्वर का घोर अपमान है कि परमेश्वर स्वय अपने ही वचनो को तोडता मरोडता है!!

आपके जानकारी के लीये:  जोर्ज मुल्लर ने टि.पि.एम के रामंकुट्टी के सौ साल पहले ही विश्वास जीवेन कि शुरुआत कि थी. रमनकुट्टी ने उन दिनो के मशहुर इस उपदेश कि नकल कि थी. जोर्ज मुल्लर ने इस सीद्धांत को परोपकार कि सेवा के लीये कैसे इस्तेमाल किया इस विशय पार आप थोडा जांच पडताल करे. पास्टर रामनकुट्टी ने इसमे से परोपकार को हटा दिया और इस सिद्धांत का कचरा बना दिया. अब टि.पि.एम के लोग आम जनता को धोका देकर कहती है कि परमेश्वर ने टि.पि.एम के चीफ पास्टर्स को विश्वास जीवन के गहरी सच्चाइ प्रकट करके दि.

विश्वासघर (फेथ होम) परमेश्वर का घर है! ओह? सचमुच?

पुराने नियम मे “मिलापवाला तम्बु” / “सुलेमान के मंदीर” को परमेश्वर का घर समझा जाता था. किंतु परमेश्वर ने पुराने नियम मे ही इस बात को साफ कर दिया था कि मंदिर परमेश्वर का घर नही था. पहले मंदीर के उद्घाटन, के समय परमेश्वर ने सुलेमान कि मुख से कहा कि,

क्या परमेश्वर सचमुच पृथ्वी पर वास करेगा, स्वर्ग में वरन सब से ऊंचे स्वर्ग में भी तू नहीं समाता, फिर मेरे बनाए हुए इस भवन में क्योंकर समाएगा (1 राजा 8:27).

फिर इस बात को परमेश्वर ने यीर्मीयाह के द्वरा इस मंदीर के नाश के समय भी इसी बात को दोहराया कि,.

तुम लोग यह कह कर झूठी बातों पर भरोसा मत रखो, कि यही यहोवा का मन्दिर है; यही यहोवा का मन्दिर, यहोवा का मन्दिर (यीर7:4)

फिर जब हेरोद के द्वारा बनाये दुसरे मंदीर के नाश के समय भी यीशु ने कहा कि यह पत्थर से बनाया मंदीर नाश होंगा, और यीशु, सच्चे मंदीर को (यीशु कि देह को) तीन दिन मे खडा करेंगे (मर्कुस 14:58). फिर यीशु के अलावा स्तीफनुस भी इस बात जोर देकर कहता है, कि मनुष्य के हाथ के बनाये स्थान मे परमेश्वर वास नही करता (प्रेरीत 7:48). प्रेरीत पौलुस भी कहता है कि इट पत्थर से बना घर नही किंतु हम विश्वासी परमेश्वर के मंदीर है (1 कुरी 3:16). हम मनुष्य परमेश्वर के मंदिर है इस बात को उत्पत्ती कि पुस्तक से ही साफ कर दिया गया था (उत्पत्ती 2:7). यह बात बाइबल मे कितनी दफा दोहराइ गइ है!

किंतु इसके बावजुद, टि.पि.एम सीखाता है कि परमेश्वर फेथहोम मे अर्थात इट-पत्थर से मनुष्य के हाथ के बनाये घरो मे रहता है. ये लोग फेथ होम को परमेश्वर का घर कहते है. टि.पि.एम के बडे सेवक अपने से छोटो का ब्रेनवाश करते है. इसके बदले मे सेवक विश्वासीयो का ब्रेनवाश करते हुये कहते है कि सेवक लोगो को परमेश्वर ने उसके घर मे रहने कि कृपा दि. फिर वे घमंड करते कि यह बहुत बडा सौभाग्य है कि परमेश्वर ने उन्हे परमेश्वर के घर मे रहने के लीये चुन लीया.

अंधा दुसरे अंधे कि अगुवाइ करते हुये

अंधे अंधो कि अगुआइ करते हुये

यीशु कभी भी किसी आश्रम मे नही रहा. उसने कहा था कि लोमडीयो के भट और पक्षीयो के बसेरे होते है किन्तु मनुष्य के पुत्र को सर रखने को भी जगह नही! यीशु गाव-गाव परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाते फिरता है. उसने गाव-गाव मे आश्रम और मठो कि स्थापना नही कि, और न उसके चेलो ने इट और पत्थर के घरो को नगर नगर मे निर्माण करवाया.

मठो और आश्रम मे रहने कि रीत साधु और सन्यासीयो के भारती परमपरा से ली गइ है.  गौतम बुद्धा और महावीर इस संसार कि माया से दुर – मठो मे रहते थे. रोमन केथोलीक ने सन 400 से ही मठो मे रहन कि रीती कि स्थापना कि.

जीसे रोमन केथोलीक लोग “मोनेस्ट्री” या “कोनवेन्ट” कहते है, और जीसे भारत के रीशीमुनी मठ और आश्रम कहते है, और जीसे बुद्धीस्ट भीक्षु “विहारा” कहते है, उसे टि.पि.एम “फेथ होम” / “परमेश्वर का घर” कहते है.

बाइबल मे न तो प्रेरीत, न यीशु और न तो परमेश्वर के वचन का कोइ भी सेवक, कभी भी किसी आश्रम मे नही रहा. ये सब अपने ही घर मे रहते थे. उन्होने सीखाया कि हम नये जन्म पाये मसीही परमेश्वर के घर है, और परमेशवर हमारे अंदर वास करता है. टि.पि.एम चर्च इसके उल्ट मे सीख देती है.

निषकर्श:  

टि.पि.एम के प्रिय विश्वासी. चौकन्ने हो जाओ! हमने अपना काम कर दिया. अब आपकी बारी है. ये लोग आपको शाही सवारी करवाते है; इन लोगो मे यह भवीश्यवानी पुरी होती है. .

उन का अन्त विनाश है, उन का ईश्वर पेट है, वे अपनी लज्ज़ा की बातों पर घमण्ड करते हैं, और पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाए रहते हैं (फिली 3:19).

वे भक्ति का भेष तो धरेंगे, पर उस की शक्ति को न मानेंगे; ऐसों से परे रहना (2 तिमुथी 3:5)

और जिस प्रकार उन लोगों में झूठे भविष्यद्वक्ता थे उसी प्रकार तुम में भी झूठे उपदेशक होंगे, जो नाश करने वाले पाखण्ड का उद्घाटन छिप छिपकर करेंगे और उस स्वामी का जिस ने उन्हें मोल लिया है इन्कार करेंगे और अपने आप को शीघ्र विनाश में डाल देंगे. और बहुतेरे उन की नाईं लुचपन करेंगे, जिन के कारण सत्य के मार्ग की निन्दा की जाएगी. और वे लोभ के लिये बातें गढ़ कर तुम्हें अपने लाभ का कारण बनाएंगे, और जो दण्ड की आज्ञा उन पर पहिले से हो चुकी है, उसके आने में कुछ भी देर नहीं, और उन का विनाश ऊंघता नहीं (2 पतरस 2:1-3)

 

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